दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को दी नई परिभाषा: शादीशुदा होने पर भी सुरक्षा का अधिकार
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि दो वयस्क यदि अपनी सहमति से साथ रह रहे हैं, तो केवल इस आधार पर उन्हें पुलिस सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि वे पहले से किसी और से शादीशुदा हैं। जस्टिस सौरभ बनर्जी की एकलपीठ ने इस मामले में याचिकाकर्ता लिव-इन कपल को तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है। यह फैसला न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है, बल्कि समाज में व्याप्त रूढ़िवादी सोच को भी चुनौती देता है।
फैसले की पूरी कहानी: क्या हुआ कोर्ट में?
यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में तब पहुंचा जब एक लिव-इन कपल ने अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि उनके परिवार और स्थानीय लोगों द्वारा धमकियां मिल रही हैं, क्योंकि दोनों पहले से शादीशुदा हैं। पुलिस ने शुरू में सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था, तर्क देते हुए कि लिव-इन रिलेशनशिप ‘अवैध’ है।
जस्टिस बनर्जी ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हर नागरिक को समान रूप से प्राप्त है। वयस्क व्यक्ति अपनी पसंद के साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं, और राज्य का कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे।” कोर्ट ने पुलिस को 48 घंटे के अंदर सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया। यह फैसला 29 अप्रैल 2026 को सुनाया गया, जो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
अनुच्छेद 21 का महत्व: जीवन का अधिकार क्यों सर्वोपरि?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है: “कोई व्यक्ति विधि की प्रक्रिया के बिना उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।” सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों से इस अनुच्छेद की व्याख्या को विस्तार दिया है। 2010 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को वैध माना था, बशर्ते वे वयस्क हों और सहमति से रहें। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उसी कड़ी का हिस्सा है।
जस्टिस बनर्जी ने फैसले में कहा, “शादीशुदा होना कोई अपराध नहीं है, और न ही इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार छिन जाता है। राज्य को नैतिकता के नाम पर हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं।” यह फैसला खासतौर पर उन मामलों में राहत देता है जहां ऑनर किलिंग या सामाजिक दबाव का खतरा होता है।
लिव-इन रिलेशनशिप पर भारत में कानूनी स्थिति: एक नजर
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन न्यायपालिका ने इन्हें मान्यता दी है। प्रमुख फैसलों की झलक:
- धरमशाला देवी बनाम सुप्रीम कोर्ट (2010): लिव-इन को वैध माना, महिला को गुजारा भत्ता का अधिकार।
- इंद्रा सरमा बनाम वीकेएस (2013): लंबे समय से साथ रहने वाले जोड़ों को कानूनी सुरक्षा।
- कंचन देवी बनाम प्रमोद कुमार रावत (2022): लिव-इन में विश्वासघात को धोखाधड़ी माना।
हालांकि, दंड संहिता की धारा 497 (व्यभिचार) को 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिससे लिव-इन को और मजबूती मिली। फिर भी, ग्रामीण इलाकों में सामाजिक स्वीकृति की कमी बनी हुई है।
इस फैसले का सामाजिक और कानूनी प्रभाव
यह फैसला महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए बड़ी राहत है। वकीलों का मानना है कि इससे पुलिस को लिव-इन मामलों में निष्पक्ष जांच करने का निर्देश मिलेगा। विशेषज्ञ वकील #expertvakil के अनुसार, “यह फैसला संविधान की आत्मा को मजबूत करता है। अब राज्य को धार्मिक या सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना होगा।”
सोशल मीडिया पर #advocate, #lawyer, #viral जैसे टैग्स के साथ यह खबर ट्रेंड कर रही है। लेकिन चुनौतियां बाकी हैं—कई राज्यों में अभी भी पुलिस रूढ़िवादी रवैया अपनाती है।
आगे की राह: क्या बदलेगा कानून?
सरकार को लिव-इन रिलेशनशिप पर स्पष्ट कानून बनाने की जरूरत है, जैसे गुजारा भत्ता और संपत्ति अधिकार। सुप्रीम कोर्ट भी इस दिशा में सक्रिय है। यह फैसला समाज को संदेश देता है: प्यार और स्वतंत्रता का अधिकार सभी का है।
WhatsApp Number for Appointment Booking : +91-8980028995 (Chargeable)
वेलोसिटी न्यूज आपको अपडेट्स देता रहेगा। क्या आपके पास कोई ऐसा अनुभव है? कमेंट्स में शेयर करें!


























