इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं!
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है। यह फैसला अनामिका और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (क्रिमिनल मिस्क रिट याचिका नंबर 3799/2026) मामले में आया है।
परिचय: एक नया कानूनी द्वार
25 वर्षों से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार के रूप में, मैंने भारत के न्यायिक फैसलों को करीब से देखा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला सामाजिक रिश्तों और कानून के बीच के बदलते समीकरण को उजागर करता है। 28 मार्च 2026 को सुनाए गए इस फैसले ने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी है। क्या शादी का बंधन अब भी उतना ही कठोर है? आइए, इस मामले की गहराई में उतरें।
मामले का पूरा विवरण
याचिकाकर्ता अनामिका और एक अन्य ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्रिमिनल मिस्क रिट याचिका दायर की थी। उनका आरोप था कि एक शादीशुदा पुरुष उनके साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, जिसके चलते उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। यूपी पुलिस ने इसकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा, “शादीशुदा व्यक्ति का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना स्वतः अपराध नहीं है।” यह फैसला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 (व्यभिचार) को भी प्रभावित करता है, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में ही अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।
कानूनी आधार और तर्क
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला दिया। जस्टिसों ने कहा कि वयस्क व्यक्तियों के बीच सहमति से रहना मौलिक अधिकार है। लिव-इन रिलेशनशिप को अब कानूनी मान्यता मिल रही है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में देखा गया—जैसे ध्वन्या बनाम उत्तर प्रदेश (2022) और इंदिरा नेगी मामला। अदालत ने चेतावनी भी दी कि यदि धोखा या धमकी हो, तो अलग कानूनी कार्रवाई हो सकती है, लेकिन मात्र लिव-इन को अपराध ठहराना गलत है। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है, क्योंकि याचिकाकर्ता महिलाएं ही थीं।
सामाजिक प्रभाव और रुझान
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप तेजी से बढ़ रहे हैं। 2025 के एनएसएसओ डेटा के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 15% युवा जोड़े इसे अपनाते हैं। यह फैसला उत्तर प्रदेश जैसे रूढ़िवादी राज्य में सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में अभी भी कलंक बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला समलैंगिक रिश्तों और डिवोर्स के बाद के जीवन को भी आसान बनाएगा। लेकिन सवाल उठता है—क्या यह शादियों को कमजोर करेगा?
पिछले फैसलों से तुलना
| फैसला | वर्ष | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ | 2018 | व्यभिचार को अपराध से बाहर किया |
| ध्वन्या बनाम यूपी | 2022 | लिव-इन को संरक्षण का अधिकार |
| अनामिका बनाम यूपी | 2026 | शादीशुदा पुरुष का लिव-इन वैध |
यह तालिका दिखाती है कि न्यायपालिका धीरे-धीरे व्यक्तिगत आजादी की ओर बढ़ रही है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञ डॉ. अपूर्वा सिंह कहती हैं, “यह फैसला प्रगतिशील है, लेकिन परिवारिक कानूनों में सुधार जरूरी।” समाजशास्त्री प्रो. राकेश मेहता जोड़ते हैं, “शहरीकरण के साथ लिव-इन नई सामान्यता बन रहा है।” हमने वकीलों से बात की—वे मानते हैं कि यह यूपी में दर्जनों मामलों को प्रभावित करेगा।
निष्कर्ष: सोचने का समय
यह फैसला हमें सोचने पर मजबूर करता है—क्या प्रेम के बंधन कानून से ऊपर हैं? अपने विचार साझा करें, कमेंट करें और दोस्तों के साथ शेयर करें। समाज बदल रहा है, आपकी आवाज महत्वपूर्ण है!
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
WhatsApp : +91-8980028995
वेबसाइट: TheVelocityNews.com
ईमेल: Info@thevelocitynews.com






















