उत्तर कोरिया और मीडिया सेंसरशिप का काला सच
उत्तर कोरिया, जिसे “हर्मिट किंगडम” (Hermit Kingdom) भी कहा जाता है, आज दुनिया के सबसे रहस्यमय और बंद देशों में से एक है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट ने एक बार फिर इस देश की क्रूर सच्चाई को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया में अगर कोई व्यक्ति विदेशी फिल्में या टीवी सीरियल देखता है, तो उसे मौत तक की सजा दी जा सकती है। यह तथ्य न केवल चौंकाने वाला है बल्कि यह साफ दर्शाता है कि किम जोंग-उन (Kim Jong Un) की सरकार किस तरह नागरिकों की आज़ादी और बुनियादी मानवाधिकारों को कुचल रही है।
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी चिंता का विषय बन गई है। सवाल यह है कि आखिर किसी देश में टीवी देखना या फिल्म देखना इतना “खतरनाक अपराध” कैसे हो सकता है?
विदेशी कंटेंट देखने पर जानलेवा सजा क्यों?
उत्तर कोरिया में मीडिया पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। वहां का राज्य-नियंत्रित टीवी और रेडियो नेटवर्क केवल वही सामग्री दिखाता है जिसे सरकार प्रचारित करना चाहती है। इसके पीछे कुछ मुख्य कारण माने जाते हैं:
- राजनीतिक नियंत्रण: विदेशी फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों के जरिए नागरिकों को बाहरी दुनिया की असलियत का पता चल सकता है।
- प्रचार तंत्र की सुरक्षा: किम जोंग-उन शासन केवल यह चाहता है कि लोग सरकारी विचारधारा और प्रचार सामग्री को ही देखे-सुने।
- आइडियोलॉजिकल खतरा: दक्षिण कोरिया के ड्रामे, हॉलीवुड फिल्में या यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल उत्तर कोरियाई नागरिकों को स्वतंत्रता और समृद्ध जीवनशैली के बारे में जानकारी दे सकते हैं, जो सरकार के लिए सीधा खतरा है।
यही वजह है कि उत्तर कोरिया ने विदेशी मीडिया देखने या रखने पर सख्त कानून बनाए हैं।
उत्तर कोरिया के “एंटी-रीएक्शनरी थॉट लॉ” का सच
उत्तर कोरिया ने 2020 में एक कानून पारित किया था जिसे “एंटी-रीएक्शनरी थॉट लॉ” कहा जाता है। इस कानून के तहत:
- दक्षिण कोरिया, अमेरिका या जापान की कोई भी फिल्म, ड्रामा या म्यूज़िक बैंड की सामग्री रखना अपराध है।
- दोषी पाए जाने वालों को मृत्युदंड या आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है।
- यहां तक कि, अगर कोई विदेशी गाने गुनगुनाता हुआ पकड़ा जाता है तो भी उसे जेल या जबरन मजदूरी शिविर (labor camps) में भेजा जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में क्या है?
संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट में कई गवाही और उदाहरण दिए गए हैं जिनमें यह पाया गया कि उत्तर कोरिया में:
- छात्रों और युवाओं को अक्सर विदेशी कंटेंट देखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
- कई नागरिकों को पब्लिक एक्सीक्यूशन (सार्वजनिक रूप से फांसी) दी गई ताकि लोग डर में रहें।
- परिवारों और पड़ोसियों को भी इन मामलों की रिपोर्ट करने के लिए मजबूर किया जाता है।
- मीडिया फ्रीडम का पूरा गला घोंटा जा चुका है और इंटरनेट का बिल्कुल सीमित और सरकार-नियंत्रित इस्तेमाल ही संभव है।
डर और खामोशी से भरा समाज
उत्तर कोरिया में जीवन का सबसे भयावह पहलू यह है कि लोग हर समय इस डर में जीते हैं कि उनकी कोई छोटी गलती उन्हें मौत तक पहुंचा सकती है।
- वहां इंटरनेट की कोई स्वतंत्रता नहीं है।
- रेडियो, टीवी और समाचार पत्र पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में हैं।
- नागरिकों को बाहरी दुनिया से कोई सीधी जानकारी नहीं मिलती।
उत्तर कोरिया के श्रम शिविरों की सच्चाई
अगर नागरिक मौत की सजा से बच भी जाते हैं तो उन्हें उत्तर कोरिया के भीषण श्रम शिविरों में भेज दिया जाता है। इन कैम्पों को कॉनसेंट्रेशन कैंप के नाम से भी जाना जाता है।
- यहां कैदियों को 12–16 घंटे तक जबरन काम करवाया जाता है।
- भोजन की बेहद कमी होती है।
- बीमारियों और प्रताड़ना की वजह से हजारों लोग इनमें मर जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और आलोचना
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के बाद दुनिया भर में मानवाधिकार संगठनों और अलग-अलग देशों ने उत्तर कोरिया की कठोर नीतियों की आलोचना की है।
- UN Human Rights Council ने कहा है कि यह नीतियां मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हैं।
- अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने भी इस व्यवहार को “क्रूर और अमानवीय” बताया है।
- कई देशों ने यह मांग की है कि उत्तर कोरिया पर इसके लिए और कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए जाएं।
उत्तर कोरियाई समाज की असलियत
उत्तर कोरिया की असल स्थिति उतनी ही भयानक है जितनी रिपोर्ट में बताई गई है।
- विदेशी गाने सुनना, दक्षिण कोरियाई ड्रामे देखना, हॉलीवुड फिल्में रखना — ये सभी वहां पूंजीवादी अपराध माने जाते हैं।
- छोटी-सी गलती भी नागरिक को मौत की सजा दिला सकती है।
- वहां स्वतंत्रता, मानवाधिकार और आज़ादी — सब एक कल्पना मात्र हैं।
क्या उत्तर कोरिया कभी बदलेगा?
यह सवाल दुनिया भर में विश्लेषकों और विशेषज्ञों के सामने खड़ा है। जब तक यह देश एक कठोर तानाशाही तंत्र के अधीन है, तब तक वहां बदलाव की संभावना बेहद कम है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव और नागरिकों की बढ़ती जागरूकता एक दिन इसमें दरार डाल सकती है। लेकिन तब तक उत्तर कोरिया के लोग मौत के साये में जीते रहेंगे, जहां फिल्म देखना या गाना सुनना भी मौत बुलाने जैसा कदम है।




