पुरुष तेज फैसले लेते हैं, लेकिन विज्ञान बताता है महिलाओं का सहयोग बेहतर क्यों है
भारतीय कॉर्पोरेट जगत में पुरुषों का वर्चस्व लंबे समय से चला आ रहा है। लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोध बता रहे हैं कि पुरुष अक्सर तेजी से फैसले लेने की होड़ में बड़ा चित्र खो देते हैं। मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में 600 से अधिक कॉर्पोरेट बोर्ड डायरेक्टर्स पर सर्वे किया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे—महिलाएं निर्णय लेने में अधिक सहयोगी और नैतिक संतुलित तरीका अपनाती हैं। वे कई दृष्टिकोणों पर विचार करती हैं, प्रतिस्पर्धी हितों को तौलती हैं और निष्पक्ष परिणाम निकालती हैं। वहीं पुरुष नियमों और परंपराओं पर निर्भर रहते हैं, जिससे व्यापक नजरअंदाज हो जाता है।
यह कोई राय नहीं, बल्कि व्यवहारिक विज्ञान पर आधारित तथ्य हैं। क्या आपने कभी सोचा कि बोर्डरूम में महिलाओं की कमी क्यों चरम फैसलों का कारण बनती है?
मैकमास्टर यूनिवर्सिटी का ऐतिहासिक शोध: महिलाओं का सहयोगी दृष्टिकोण
मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के डीग्रोट स्कूल ऑफ बिजनेस के शोधकर्ताओं ने 2013 में बार्ट एंड मैकक्वीन के साथ मिलकर इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बिजनेस गवर्नेंस एंड एथिक्स में अध्ययन प्रकाशित किया। इसमें 600+ बोर्ड डायरेक्टर्स से पूछा गया कि वे कैसे फैसले लेते हैं।
- महिलाओं की रणनीति: वे कई पक्षों को सुनती हैं, नैतिक संतुलन बनाती हैं। उदाहरणस्वरूप, कंपनी की नीतियों में कर्मचारियों और ग्राहकों दोनों के हित देखती हैं।
- पुरुषों की प्रवृत्ति: नियम-कायदों पर जोर, परंपरागत तरीके अपनाते हैं। इससे लंबे समय के जोखिम नजरअंदाज हो जाते हैं।
- नतीजा: महिलाओं वाले ग्रुप्स में फैसले अधिक निष्पक्ष और टिकाऊ साबित हुए।
यह शोध भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक है, जहां एनएसई और बीएसई की कंपनियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। एनआईटीआई आयोग की रिपोर्ट्स भी यही पुष्टि करती हैं कि विविधता से निर्णय गुणवत्ता 20% बेहतर होती है।
बोस्टन कॉलेज का अध्ययन: महिलाओं की मौजूदगी में संतुलन क्यों आता है?
जर्नल ऑफ कंज्यूमर रिसर्च में 2016 में निकोलोवा एंड लैम्बर्टन का शोध प्रकाशित हुआ। बोस्टन कॉलेज के कैरल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ने निर्णय लेने वाले जोड़ों पर फोकस किया।
- महिला-पुरुष जोड़ी: हमेशा समझौता और संतुलन उभरता है। चरम विकल्प टल जाते हैं।
- केवल पुरुष जोड़ी: अतिवादी फैसले, जैसे जोखिम भरे निवेश या कटौती।
- वैज्ञानिक आधार: महिलाएं स्वाभाविक रूप से रुककर सुनती हैं, सभी कोणों पर विचार करती हैं।
भारत में स्टार्टअप कल्चर में यह दिखता है—फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों में महिलाओं की भूमिका ने संतुलित वृद्धि दी। शोध कहता है, पुरुष जो महिलाओं की सलाह मानते हैं, वे कमजोरी नहीं, बुद्धिमत्ता दिखाते हैं।
भारतीय कॉर्पोरेट जगत में सबक: महिलाओं की आवाज सुनने का समय
भारत में महिलाओं की बोर्ड भागीदारी 2023 में 18% पहुंची (मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स डेटा), लेकिन अभी रास्ता लंबा है। रिलायंस और टीसीएस जैसे ग्रुप्स में सफल उदाहरण हैं जहां महिलाओं ने संकटों में संतुलन बनाया।
विज्ञान पुष्टि करता है—सबसे अच्छे फैसले उन बातचीतों से निकले जो पुरुष अक्सर क्रेडिट नहीं देते। घर से लेकर ऑफिस तक, महिलाओं को सुनना पुरुषों के लिए सुपरपावर है।
निष्कर्ष: निर्णय विज्ञान का संदेश—सुनो, रुको, जीतो
ये अध्ययन बताते हैं कि तेजी से फैसले पुरुषों की ताकत लगते हैं, लेकिन महिलाओं का सहयोग भविष्य की कुंजी है। लीडरशिप में जेंडर बैलेंस जरूरी। क्या आप अपने फैसलों में महिलाओं की राय को अधिक महत्व देंगे?
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