कानपुर में उजागर हुए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट ने अब उत्तर प्रदेश की राजधानी गाजियाबाद तक अपनी जड़ें फैला दी हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, पूरे सूबे में 50 से अधिक अस्पताल और नर्सिंग होम इस घोटाले के घेरे में आ गए हैं। यह मामला न केवल चिकित्सा नैतिकता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों का शोषण उजागर करता है। Kanpur Kidney Racket के इस नेटवर्क में ओटी टेक्निशियन कुलदीप सिंह राघव की गिरफ्तारी के बाद राजेश कुमार नामक एक अन्य आरोपी की भूमिका भी सामने आई है। दोनों के आपसी संबंध और अस्पतालों से गहरे कनेक्शन ने जांच को नई गति दी है। #thevelocitynews | The Velocity News
रैकेट का खुलासा: कैसे पकड़ा गया कानपुर किडनी रैकेट?
कानपुर के एक निजी अस्पताल में गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने छापेमारी की, जहां अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का धंधा फल-फूल रहा था। मुख्य आरोपी कुलदीप सिंह राघव, जो ओटी टेक्निशियन है, को मौके से गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उसने खुलासा किया कि वह कई अस्पतालों में ऑपरेशन थिएटर संभालता था और दानदाताओं को लाकर ट्रांसप्लांट करवाता था। राजेश कुमार, जो कथित रूप से ब्रोकर का काम करता था, अभी फरार है, लेकिन उसके फोन रिकॉर्ड्स में 20 से अधिक अस्पतालों के संपर्क नंबर मिले हैं।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, गरीब मजदूरों और बेरोजगार युवाओं को 2-5 लाख रुपये देकर उनकी किडनी खरीदी जाती थी, जबकि अमीर मरीजों को 20-30 लाख में ट्रांसप्लांट कराया जाता। ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट (THOA) 1994 के तहत यह पूरी तरह अवैध है, क्योंकि दानदाता और रिसीवर के बीच कोई पारिवारिक संबंध नहीं था।
गाजियाबाद कनेक्शन: रैकेट का नया केंद्र कैसे बना?
Kanpur Kidney Racket की जांच अब गाजियाबाद पहुंच गई है, जहां दो नर्सिंग होम्स पर रेड पड़ी। यहां कुलदीप और राजेश के सहयोगी डॉक्टरों के नाम सामने आए हैं। गाजियाबाद पुलिस ने बताया कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के कई बड़े अस्पताल इस चेन का हिस्सा हैं। कुलदीप के बैंक खातों से 50 लाख से अधिक की संदिग्ध ट्रांजेक्शन पकड़ी गईं, जो गाजियाबाद के एक क्लिनिक से जुड़ी हैं।
जांच एजेंसियां—like यूपी एसटीएफ और सीबीआई—अब पूरे नेटवर्क को तोड़ने पर जुटी हैं। अनुमान है कि पिछले दो वर्षों में 100 से अधिक ट्रांसप्लांट हो चुके हैं।
50+ अस्पतालों पर शिकंजा: कौन-कौन फंसे जांच के जाल में?
| जिला | प्रभावित अस्पताल/नर्सिंग होम | स्थिति |
|---|---|---|
| कानपुर | 15+ निजी अस्पताल | छापे मारी, दस्तावेज जब्त |
| गाजियाबाद | 8 नर्सिंग होम | रेड जारी, डॉक्टर पूछताछ |
| लखनऊ | 10 बड़े हॉस्पिटल | नोटिस जारी |
| अन्य (आगरा, मेरठ) | 20+ | जांच प्रारंभ |
यह तालिका जांच एजेंसियों के प्रारंभिक आंकड़ों पर आधारित है। सभी जगहों पर मरीजों के रिकॉर्ड, दानदाता फॉर्म और सर्जिकल इक्विपमेंट की जांच हो रही है।
कानूनी कोण: THOA कानून की धज्जियां उड़ाने वाले अपराधी
ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट के उल्लंघन में 10 वर्ष तक की सजा और लाखों का जुर्माना हो सकता है। इस Kanpur Kidney Racket में डॉक्टरों की मिलीभगत साबित होने पर उनकी मेडिकल लाइसेंस रद्द हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑर्गन ट्रैफिकिंग भारत में सालाना 2000 करोड़ का काला कारोबार है, जिसमें यूपी अग्रणी राज्य है।
समाज पर प्रभाव: गरीबों की किडनी बेचने का धंधा क्यों फल-फूल रहा?
यह रैकेट गरीबी, बेरोजगारी और जागरूकता की कमी का शिकार है। कानपुर के ट्रांस गंगा इलाके से कई युवा लापता बताए जा रहे हैं। एनजीओ ‘प्रथम’ के अनुसार, ग्रामीण भारत में 30% लोग ऑर्गन डोनेशन नियमों से अनभिज्ञ हैं। सरकार को सख्त निगरानी और जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
आगे की जांच और सिफारिशें
जांच तेजी से फैल रही है, सीबीआई को शामिल करने की मांग उठ रही है। सरकार ने यूपी में ऑर्गन ट्रांसप्लांट कमिटी को अलर्ट किया है। नागरिकों से अपील: संदिग्ध गतिविधि देखें तो हेल्पलाइन 1098 पर शिकायत करें।
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