परिचय
पार्किंसन रोग एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है जो धीरे-धीरे मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करती है जो हमारे शरीर की गति को नियंत्रित करते हैं। यह रोग मुख्यतः मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रासायनिक पदार्थ का कमी होने से होता है। डोपामाइन का काम सामान्य और सटीक शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करना है। जब यह कमी होती है, तो व्यक्ति को अनेक लक्षणों से जूझना पड़ता है जैसे कि कंपन, मांसपेशियों की कठोरता, धीमी गति और संतुलन की समस्या। इसके कारण व्यक्ति का जीवन अब पहले जैसा सहज नहीं रह पाता है।
हालांकि यह बीमारी अधिकतर 60 वर्ष या उससे ऊपर के लोगों में पाई जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में युवा लोगों में भी इसके मामलों में वृद्धि देखी गई है। भारत में पार्किंसन रोगी की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जो भविष्य में एक बड़ी स्वास्थ्य चिंता बन सकती है। इसी कारण The Velocity News ने इस बीमारी पर विस्तार से और गहराई से शोध कर इसे आपके सामने प्रस्तुत किया है।
पार्किंसन रोग के कारण
पार्किंसन रोग के कारण अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार यह निम्न कारणों से हो सकता है:
- तंत्रिका कोशिकाओं का धीरे-धीरे नष्ट होना, जो डोपामाइन उत्पन्न करती हैं।
- कुछ आनुवांशिक (genetic) बदलाव या म्युटेशन।
- पर्यावरणीय कारक जैसे, कीटनाशकों, भारी धातुओं का संपर्क।
- उम्र बढ़ने के कारण मस्तिष्क की कोशिकाएं कमजोर हो जाती हैं।
इसके अलावा मानसिक तनाव और कुछ दवाओं का लंबे समय तक उपयोग भी इस रोग को बढ़ावा दे सकता है। डॉ. पुणीत अग्रवाल, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के अनुसार, लगभग 10-15% मामले आनुवांशिक होते हैं, जबकि बाकी के कारण पर्यावरणीय और अन्य कारकों से संबंधित होते हैं।
पार्किंसन रोग के मुख्य लक्षण
पार्किंसन रोग बहुत धीरे-धीरे विकसित होता है, इसलिए शुरुआत में इसका पता लगाना मुश्किल हो सकता है। शुरुआती लक्षण हल्के और अस्थायी हो सकते हैं। प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:
- कंपन (Tremors): आराम की स्थिति में एक या दोनों हाथों, उंगलियों में कंपन शुरू हो जाता है। इसे पिल-रोलिंग कंपकंपी भी कहते हैं।
- धीमी गति (Bradykinesia): शारीरिक गतिविधि में सुस्ती या धीमापन आता है। चलना-फिरना सामान्य से धीमा हो जाता है।
- मांसपेशियों की कठोरता (Muscle Rigidity): मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं जिससे शरीर की लचीलापन कम हो जाता है।
- संतुलन और समन्वय की समस्या (Balance and Coordination issues): गिरने की संभावना बढ़ जाती है।
- मूड और मानसिक बदलाव: डिप्रेशन, चिंता, नींद में परेशानी और स्मृति संबंधी समस्याएं।
यह लक्षण समय के साथ बढ़ते जाते हैं और मरीज के दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। यह रोग दोनों तरफ के शरीर के अंगों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन सामान्यतः पहले एक तरफ शुरू होता है।
पार्किंसन रोग का निदान और जांच
पार्किंसन रोग का निदान मुख्यतः चिकित्सीय जांच और रोगी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है। डॉक्टर निम्नलिखित परीक्षण कर सकते हैं:
- रोगी का पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक परीक्षण।
- दोपामाइन ट्रांसपोर्टर स्कैन (DAT Scan) जो मस्तिष्क में डोपामाइन की मात्रा को मापता है।
- अन्य तंत्रिका तंत्र के विकारों को अलग करने के लिए जांच।
हालांकि, कोई रक्त परीक्षण या सामान्य जांच पार्किंसन रोग की पुष्टि के लिए सीधे उपयोगी नहीं होती। रोग के प्रारंभिक चरण में पहचान मुश्किल हो सकती है, इसलिए अनुभवी तंत्रिका विशेषज्ञ से संपर्क जरूरी है।
भारत में पार्किंसन रोग की स्थिति और आंकड़े
भारत में पार्किंसन रोग की आशंका और मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके पीछे जीवनशैली में बदलाव, प्रदूषण, और बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं मुख्य कारण हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक भारत में पार्किंसन के मरीजों की संख्या 2.8 मिलियन के करीब पहुंच सकती है, जो वैश्विक मामलों का लगभग 10% होगा।
अधिकतर मरीज 50 साल की उम्र के बाद प्रभावित होते हैं, लेकिन अब यह रोग युवा वर्ग में भी फैल रहा है। भारत में लगभग 40-45% मरीजों में ये लक्षण 22 से 49 साल की उम्र के बीच शुरू हो जाते हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि समय रहते जागरूकता और इलाज की आवश्यकता है।
पार्किंसन रोग का उपचार
पार्किंसन रोग का कोई स्थायी इलाज अभी तक खोजा नहीं गया है, पर आधुनिक चिकित्सा रोग के लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित कर सकती है। उपचार के मुख्य तरीके हैं:
- दवाइयाँ: डोपामाइन की कमी को पूरा करने या उसकी गतिविधि बढ़ाने वाली दवाइयाँ दी जाती हैं।
- सर्जरी: डिप ब्रेन स्टीमलेशन जैसी तकनीकें जो मस्तिष्क के प्रभावित हिस्सों पर काम करती हैं।
- शारीरिक चिकित्सा: फिजिकल थेरेपी से गतिशीलता बढ़ाने और मांसपेशियों की जकड़न कम करने में मदद मिलती है।
- समूह या मनोवैज्ञानिक सहायता: मानसिक स्वास्थ्य को संभालने के लिए ये आवश्यक है।
इसके अलावा, नवीन शोध जैसे कि सेल थेरेपी और नई दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल भी चल रहे हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में जांच में एक नई दवा “Prasinezumab” का ट्रायल हो रहा है जो रोग की प्रगति को धीमा कर सकती है।

जीवनशैली में बदलाव
पार्किंसन रोग से पीड़ित व्यक्तियों के लिए जीवनशैली में कुछ बदलाव जरूरी होते हैं, जैसे:
- नियमित व्यायाम करें, जिससे मांसपेशियां मजबूत बनी रहें।
- संतुलित आहार लें।
- मनोवैज्ञानिक तनाव से बचें।
- सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लें।
The Velocity News की जिम्मेदारी
The Velocity News हमेशा अपने पाठकों को सटीक, नवीन और उपयोगी जानकारी देने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। पार्किंसन रोग जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं पर विस्तार से जागरूकता बढ़ाना और सही उपचार के विकल्पों को समझाना हमारा उद्देश्य है। चिकित्सा जगत में हो रहे नये शोधों और तकनीकों पर भी हम नजर बनाए रखते हैं, ताकि हमारे पाठक सटीक जानकारी पा सकें।
निष्कर्ष
पार्किंसन रोग एक जटिल लेकिन प्रबंधनीय स्थिति है। समय रहते इसकी पहचान और उचित उपचार जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकता है। जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। इसलिए इस लेख को अपने परिवार और मित्रों के साथ जरूर साझा करें, ताकि वे भी इस बीमारी के बारे में जागरूक रहें। आपकी टिप्पणियाँ और अनुभव हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं, कृपया कमेंट करके हमें अवश्य बताएं।
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